ओरायन तारामंडल में जो हमारी पृथ्वी से कई प्रकाश वर्ष दूर है वहां कई ऐसे गृह है जहाँ जीवन और विज्ञान हमसे कई गुना ज्यादा विकसित है, विकास क्रम की ये धारायें मूलतः दो भागों में बटी हुयी है पहली विचारधारा के लोग सोच से पूर्णतः अतिवादी है और विज्ञान का प्रयोग केवल वो अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए करते है उनकी एकमात्र सोच केवल विकसित जीवों के लिए ही सम्पूर्ण बह्मांड के जीवित गृह उपभोग की सामग्री है और वो विज्ञान के अत्यआधुनिक ज्ञान का प्रयोग केवल नवपल्लवित व अल्पविकसित गृहों पर अधिपत्य जमाने के लिए करते हैं ,मुख्यरूप से क्रोधी प्रवर्त्ती की यह विचारधारा रखने वाले ये लोग विज्ञान का प्रयोग विध्वंविध्वंसक अस्त्र बनाने में इस असीमित ज्ञान का प्रयोग करते हैं इन्हें कल्पासा विचार धारा वाला कहा जाता है और इसमें कई सभ्यताओं के प्राणी आते हैं पर प्रमुखता से क्षकार सभ्यता के लोग कुशल नेतृत्व के कारण इनमें मुख्य रूप से एक नेता या सेनापति की भूमिका निभाते है |
इसके विपरीत दूसरी विचारधारा उदीयनों की जो विज्ञान के अतिरिक्त शिल्प साहित्य स्थापत्यकला चिकित्सा विज्ञान और अध्यात्म में भी काफी विकसित है इन्होने अपने ज्ञान विज्ञान का प्रयोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपो में किया है, इसलिए नकारात्मक पहलू की सकारात्मकता से तुलना कर ये जान चुके है कि सत्य क्या है और इसी कारण ये विचारधारा वाले अत्यंत शान्ति प्रिय धैर्यवान और विवेकी है ये मानते है कि जीवित गृह पर जो भी विकास चरण में उदविकास के क्रम में बुद्धि का अंश भी लेकर पैदा हुआ है उस का अधिकार सबसे प्रथम और अधिक है क्योंकि यदि प्रकृति अनुकूलित रही तो वो भी हमारी बराबरी कर लेंगे नहीं कर पाये तो प्रकृति खुद उनका समापन करके दूसरे विकसित जीव को उदविकास की कड़ी में आगे कर देगी|उदीयनो में भी कई सभ्यतायें है पर चतुर बुद्धि और चपलता और हर परिस्थिति में संयम के कारण दिमित्री सभ्यता हमेशा उदीयनों में सर्वोपरि और उनका नेतृत्व करने वाली रही है
विचारों का यही विरोधाभास हमेशा से कल्पासा और उदीयनों में युद्ध का कारण बना है कुशल आक्रमण करने के बावजूद बचाव के कोई उपाय ना होने से कल्पासा अपनी हतबुद्धि से युद्ध प्रारम्भ करते हैं और हारते है यदि ओरायन जीव रक्षण संघ ना होता तो अभी तक कल्पासा विचारधारा के लोग अपना अस्तित्व उदीयनों से युद्ध करके मिटा चुके होते
क्रमशः
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